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एफ आई आर की कॉपी देर से मजिस्ट्रेट को भेजने की वजह से सुनवाई पर असर नहीं पड़ेगा :
सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर :
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न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति विनीत शरण पीठ ने जब फिर विश्वास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि
अगर रिपोर्ट किसी वजह है या गलती से विलम से भेजा जाता है तो इसके कारण सुनवाई पर प्रभावित नहीं होगा सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को एफ आई आर की कॉपी भेजने में होने वाली देरी की वजह से मामले की सुनवाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए और इस तरह का निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि इस आधार पर आरोपी को दोष मुक्त किया जा सकता |
याचिकाकर्ता आरोपी के वकील पियूष राय ने f.i.r. से देरी से भेजने के मामले को सीआरपीसी की धारा 157 का उल्लंघन माना यह अपील हत्या के एक मामले से संबंधित है जिसमें हाईकोर्ट ने छह आरोपी को अपराध का दोषी मानते हुए सजा सुनाई है|
कोर्ट ने आगे कहा ...
अगर एफआईआर दर्ज करने के समय और तिथि को लेकर सवाल उठाया जाता है तो उस स्थिति में रिपोर्ट ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है पर रिपोर्ट भेजने में महज तेरी काया निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि सुनवाई की प्रक्रिया बाधित हो गई है या आरोपी को इस आधार पर बरी किया जा सकता है
कोर्ट ने कहा कि f.i.r. की प्रति भेजने में विलंब के पीछे कोई दुर्भावना है यहां आरोपी को सिद्ध करना है कोर्ट ने कहा जहां तक की वर्तमान मामले की बात है वह यह गौर करना पर्याप्त है कि कभी अपील करता ओं का नाम एफ आई आर में है इसलिए रिपोर्ट में 3 नामों को जोड़ना नहीं कहीं से भी अपील कर्ताओं के प्रति दुर्भावना को प्रदर्शित नहीं करता है |
आगे कोर्ट ने यह कहा इस संदर्भ में राजस्थान राज्य बनाम दाऊद खान मामले में आए फैसले का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेजने का काम जांच अधिकारी का है पर कोर्ट का मानना है कि अगर रिपोर्ट भेजने में किसी गलती की वजह से देरी होती है तो मामले की सुनवाई पर इसका असर नहीं पढ़ना चाहिए
पीठ ने हाईकोर्ट के इस बात का भी समर्थन किया कि f.i.r. सही है कि गलत और निचली अदालत द्वारा आरोपी को दंडित करना सही है कि नहीं यह पता करने के लिए संपूर्ण साक्ष्य की जांच करनी चाहिए|
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