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Supreme Court quashes case against Mahendra Singh Dhoni // महेंद्र सिंह धोनी बनाम येरागुतला श्याम सुंदर एवं अन्य
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Supreme Court quashes case against Mahendra Singh Dhoni
Judgement related to Mahendra singh dhoni's case.
महेंद्र सिंह धोनी
Judgement related to Mahendra singh dhoni's case.
महेंद्र सिंह धोनी
बनाम
येरागुतला श्याम सुंदर एवं अन्य ...
न्यायधीश ...
1. न्यायमूर्ति दीपक मिश्र 2. न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर 3. न्यायमूर्ति मोहन शांतनगोदर
धारा 200 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत.....
वाद के तथ्य ~ इस बाद में प्रतिवादी ने एक पत्रिका ग्रह की जिसमें धोनी का चित्र गॉड ऑफ बिग डील्स शीर्षक अंतर्गत छपा था इस पर परिवादी ने प्रथम सूचना दर्ज कराना चाहा एवं ना होने पर एक परिवाद अंतर्गत धारा 295 क/34 भारतीय दंड संहिता मैं किया | याची महेद्रर सिंह धोनी ने इसे अंतरित करने एवं निरस्त करने के लिए याचिका दी |
निर्णय ~
इसमें तथ्यों से धारा 295 को के अंतर्गत अपराध घटित नहीं होता अतः उच्च न्यायालय ने परिवार निरस्त किया उच्च न्यायालय ने भी आधारित किया कि इससे धारा 295 को के अंतर्गत अपराध घटित नहीं होता है अतः परिवाद निरस्त किया जाता है|
धारा 295 क ~
विमशित और विदेश पूर्ण कार्य जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आशय से किए गए हो जो कोई भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के विभूषित और विदेश कोड आशय से उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान चरित या लिखित शब्दों द्वारा या संकेतों या दृश्य रुपयों द्वारा या अन्यथा करेगा या करने का प्रयत्न करेगा वह दोनों में से किसी भारती के कारावास से जिसकी अवधि 3 वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा|धारा 200 परिवाद की परीक्षा ~
परिवार पर किसी अपराध का संज्ञाान करने वाला मजिस्ट्रेट परिवादी की और यदि कोई साक्षी उपस्थित है तो उनकी शपथ पर परीक्षा का सारांश लेखन किया जाएगा और परिवादी और साक्ष्यों द्वारा तथा मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षरित किया जाएगा परंतुुुु जब परिवा द लिख कर किया जाता है सब मजिस्ट्रेट के लिए परिवादी या साक्ष्यों की परीक्षा करना आवश्यक य ना होगा
1. यदि परिवार अपने पद्य कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य करने वाले या कार्य करने का तात्पर्य रखने वाले लोक सेवक द्वारा या न्यायालय द्वारा किया गया है अथवा
2. यदि मजिस्ट्रेट जांच का विचारण के लिए मामले को धारा 192 के अधीन किसी अन्य मजिस्ट्रेट के हवाले कर देता है |
परंतु यह और कि यदि मजिस्ट्रेट परिवादी या साक्ष्यों की परीक्षा करने के पश्चात मामले को धारा 192 के अधीन किसी अन्य मजिस्ट्रेट के हवाले करता है तो वाद वाले मजिस्ट्रेट के लिए फिर से परीक्षा करना आवश्यक है ना होगा |
इसमें कार्यवाही की अपेक्षित शर्त अंकित है |
निष्कर्ष~
जब अपराध को करने वाले कोई तत्व नहीं है इस पर परिवाद नहीं हो सकता |Supreme Court causes case against Mahendra Singh DhoniS
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Location:
India
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